॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.14.28
क्वापि देवमायया स्त्रिया भुजलतोपगूढः प्रस्कन्नविवेकविज्ञानो यद्विहारगृहारम्भाकुलहृदयस्तदाश्रयावसक्तसुतदुहितृकलत्रभाषितावलोकविचेष्टितापहृतहृदय आत्मानमजितात्माऽपारेऽन्धे तमसि प्रहिणोति॥ २८॥
kvāpi devamāyayā striyā bhujalatopagūḍhaḥ praskannavivekavijñāno yadvihāragṛhārambhākulahṛdayastadāśrayāvasaktasutaduhitṛkalatrabhāṣitāvalokaviceṣṭitāpahṛtahṛdaya ātmānamajitātmā'pāre'ndhe tamasi prahiṇoti|| 28||
अर्थ
(इस विघ्नबहुल मार्गमें इस प्रकार भटकता हुआ यह जीव) किसी समय देवमायारूपिणी स्त्रीके बाहुपाशमें पड़कर विवेकहीन हो जाता है। तब उसीके लिये विहारभवन आदि बनवानेकी चिन्तामें ग्रस्त रहता है तथा उसीके आश्रित रहनेवाले पुत्र, पुत्री और अन्यान्य स्त्रियोंके मीठे-मीठे बोल, चितवन और चेष्टाओंमें आसक्त होकर, उन्हींमें चित्त फँस जानेसे वह इन्द्रियोंका दास अपार अन्धकारमय नरकोंमें गिरता है॥ २८॥