उनके यज्ञमें बहुत अधिक सोमपान करनेसे इन्द्र उन्मत्त हो गये थे, तथा उनके अत्यन्त श्रद्धा तथा विशुद्ध और निश्चल भक्तिभावसे समर्पित किये हुए यज्ञफलको भगवान् यज्ञपुरुषने साक्षात् प्रकट होकर ग्रहण किया था॥ १२॥✎ 453454
यस्याध्वरे भगवानध्वरात्मा
मघोनि माद्यत्युरुसोमपीथे।
श्रद्धाविशुद्धाचलभक्तियोग-
समर्पितेज्याफलमाजहार ॥ १२
उनके यज्ञमें बहुत अधिक सोमपान करनेसे इन्द्र उन्मत्त हो गये थे, तथा उनके अत्यन्त श्रद्धा तथा विशुद्ध और निश्चल भक्तिभावसे समर्पित किये हुए यज्ञफलको भगवान् यज्ञपुरुषने साक्षात् प्रकट होकर ग्रहण किया था॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.15.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 640) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/15/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)