श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.15.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यस्याध्वरे भगवानध्वरात्मा

मघोनि माद्यत्युरुसोमपीथे।

श्रद्धाविशुद्धाचलभक्तियोग-

समर्पितेज्याफलमाजहार ॥ १२

yasyādhvare bhagavānadhvarātmā

maghoni mādyatyurusomapīthe|

śraddhāviśuddhācalabhaktiyoga-

samarpitejyāphalamājahāra || 12

अर्थ

उनके यज्ञमें बहुत अधिक सोमपान करनेसे इन्द्र उन्मत्त हो गये थे, तथा उनके अत्यन्त श्रद्धा तथा विशुद्ध और निश्‍चल भक्तिभावसे समर्पित किये हुए यज्ञफलको भगवान् यज्ञपुरुषने साक्षात् प्रकट होकर ग्रहण किया था॥ १२॥✎ 453 454

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #453 शब्दोंके बीचका स्थान: थे,तथा → थे, तथा
  • #454 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें