श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.15.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यत्प्रीणनाद्बर्हिषि देवतिर्यङ्

मनुष्यवीरुत्तृणमाविरिञ्च्यात् ।

प्रीयेत सद्यः स ह विश्‍वजीवः

प्रीतः स्वयं प्रीतिमगाद्गयस्य॥ १३

yatprīṇanādbarhiṣi devatiryaṅ

manuṣyavīruttṛṇamāviriñcyāt |

prīyeta sadyaḥ sa ha viśvajīvaḥ

prītaḥ svayaṃ prītimagādgayasya|| 13

अर्थ

जिनके तृप्त होनेसे ब्रह्माजीसे लेकर देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, वृक्ष एवं तृणपर्यन्त सभी जीव तत्काल तृप्त हो जाते हैं—वे विश्वात्मा श्रीहरि नित्यतृप्त होकर भी राजर्षि गयके यज्ञमें तृप्त हो गये थे। इसलिये उनकी बराबरी कोई दूसरा व्यक्ति कैसे कर सकता है?॥ १३॥✎ 453 454

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #453 शब्दोंके बीचका स्थान: थे,तथा → थे, तथा
  • #454 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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