श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.16.7

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

ऋषिरुवाच

न वै महाराज भगवतो मायागुणविभूतेः काष्ठां मनसा वचसा वाधिगन्तुमलं विबुधायुषापि पुरुषस्तस्मात्प्राधान्येनैव भूगोलकविशेषं नामरूपमानलक्षणतो व्याख्यास्यामः॥ ४॥ यो वायं द्वीपः कुवलयकमलकोशाभ्यन्तरकोशो नियुतयोजनविशालः समवर्तुलो यथा पुष्करपत्रम्॥ ५॥ यस्मिन्‍नव वर्षाणि नवयोजनसहस्रायामानि अष्टभिर्मर्यादागिरिभिः सुविभक्तानि भवन्ति॥ ६॥ एषां मध्ये इलावृतं नामाभ्यन्तरवर्षं यस्य नाभ्यामवस्थितः सर्वतः सौवर्णः कुलगिरिराजो मेरुर्द्वीपायामसमुन्‍नाहः कर्णिकाभूतः कुवलयकमलस्य मूर्धनि द्वात्रिंशत् सहस्रयोजनविततो मूले षोडशसहस्रं तावतान्तर्भूम्यां प्रविष्टः॥ ७॥

eṣāṃ madhye ilāvṛtaṃ nāmābhyantaravarṣaṃ yasya nābhyāmavasthitaḥ sarvataḥ sauvarṇaḥ kulagirirājo merurdvīpāyāmasamunnāhaḥ karṇikābhūtaḥ kuvalayakamalasya mūrdhani dvātriṃśat sahasrayojanavitato mūle ṣoḍaśasahasraṃ tāvatāntarbhūmyāṃ praviṣṭaḥ|| 7||

अर्थ

इनके बीचो-बीच इलावृत नामका दसवाँ वर्ष है, जिसके मध्यमें कुलपर्वतोंका राजा मेरुपर्वत है। वह मानो भूमण्डलरूप कमलकी कर्णिका ही है। वह ऊपरसे नीचेतक सारा-का-सारा सुवर्णमय है और एक लाख योजन ऊँचा है। उसका विस्तार शिखरपर बत्तीस हजार और तलैटीमें सोलह हजार योजन है तथा सोलह हजार योजन ही वह भूमिके भीतर घुसा हुआ है अर्थात् भूमिके बाहर उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है॥ ७॥✎ 455

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #455 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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