॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.16.8
उत्तरोत्तरेणेलावृतं नीलः श्वेतः शृङ्गवानिति त्रयो रम्यकहिरण्मयकुरूणां वर्षाणां मर्यादागिरयः प्रागायता उभयतः क्षारोदावधयो द्विसहस्रपृथव एकैकशः पूर्वस्मात्पूर्वस्मादुत्तर उत्तरो दशांशाधिकांशेन दैर्घ्य एव ह्रसन्ति॥ ८॥
uttarottareṇelāvṛtaṃ nīlaḥ śvetaḥ śṛṅgavāniti trayo ramyakahiraṇmayakurūṇāṃ varṣāṇāṃ maryādāgirayaḥ prāgāyatā ubhayataḥ kṣārodāvadhayo dvisahasrapṛthava ekaikaśaḥ pūrvasmātpūrvasmāduttara uttaro daśāṃśādhikāṃśena dairghya eva hrasanti|| 8||
अर्थ
इलावृतवर्षके उत्तरमें क्रमशः नील, श्वेत और शृंगवान् नामके तीन पर्वत हैं—जो रम्यक, हिरण्मय और कुरु नामके वर्षोंकी सीमा बाँधते हैं। वे पूर्वसे पश्चिमतक खारे पानीके समुद्रतक फैले हुए हैं। उनमेंसे प्रत्येककी चौड़ाई दो हजार योजन है तथा लम्बाईमें पहलेकी अपेक्षा पिछला क्रमशः दशमांशसे कुछ अधिक कम है, चौड़ाई और ऊँचाई तो सभीकी समान है॥ ८॥