श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.17.22

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

यस्याद्य आसीद् गुणविग्रहो महान्

विज्ञानधिष्ण्यो भगवानजः किल।

यत्सम्भवोऽहं त्रिवृता स्वतेजसा

वैकारिकं तामसमैन्द्रियं सृजे॥ २२

yasyādya āsīd guṇavigraho mahān

vijñānadhiṣṇyo bhagavānajaḥ kila|

yatsambhavo'haṃ trivṛtā svatejasā

vaikārikaṃ tāmasamaindriyaṃ sṛje|| 22

अर्थ

जिनसे उत्पन्‍न हुआ मैं अहंकाररूप अपने त्रिगुणमय तेजसे देवता, इन्द्रिय और भूतोंकी रचना करता हूँ—वे विज्ञानके आश्रय भगवान् ब्रह्माजी भी आपके ही महत्तत्त्वसंज्ञक प्रथम गुणमय स्वरूप हैं॥ २२॥✎ 456 1977

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #456 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #1977 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): तरफ → तरह

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