महात्मन्! महत्तत्त्व, अहंकार-इन्द्रियाभिमानी देवता, इन्द्रियाँ और पंचभूत आदि हम सभी डोरीमें बँधे हुए पक्षीके समान आपकी क्रियाशक्तिके वशीभूत रहकर आपकी ही कृपासे इस जगत्की रचना करते हैं॥ २३॥✎ 4561977
एते वयं यस्य वशे महात्मनः
स्थिताः शकुन्ता इव सूत्रयन्त्रिताः।
महानहं वैकृततामसेन्द्रियाः
सृजाम सर्वे यदनुग्रहादिदम्॥ २३
महात्मन्! महत्तत्त्व, अहंकार-इन्द्रियाभिमानी देवता, इन्द्रियाँ और पंचभूत आदि हम सभी डोरीमें बँधे हुए पक्षीके समान आपकी क्रियाशक्तिके वशीभूत रहकर आपकी ही कृपासे इस जगत्की रचना करते हैं॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.17.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 648) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/17/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#456 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को
#1977 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): तरफ → तरह