॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.18.20
स वै पतिः स्यादकुतोभयः स्वयं
समन्ततः पाति भयातुरं जनम्।
स एक एवेतरथा मिथो भयं
नैवात्मलाभादधि मन्यते परम्॥ २०
sa vai patiḥ syādakutobhayaḥ svayaṃ
samantataḥ pāti bhayāturaṃ janam|
sa eka evetarathā mitho bhayaṃ
naivātmalābhādadhi manyate param|| 20
अर्थ
सच्चा पति (रक्षा करनेवाला या ईश्वर) वही है, जो स्वयं सर्वथा निर्भय हो और दूसरे भयभीत लोगोंकी सब प्रकारसे रक्षा कर सके। ऐसे पति एकमात्र आप ही हैं; यदि एकसे अधिक ईश्वर माने जायँ, तो उन्हें एक-दूसरेसे भय होनेकी सम्भावना है। अतएव आप अपनी प्राप्तिसे बढ़कर और किसी लाभको नहीं मानते॥ २०॥