श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.20

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स वै पतिः स्यादकुतोभयः स्वयं

समन्ततः पाति भयातुरं जनम्।

स एक एवेतरथा मिथो भयं

नैवात्मलाभादधि मन्यते परम्॥ २०

sa vai patiḥ syādakutobhayaḥ svayaṃ

samantataḥ pāti bhayāturaṃ janam|

sa eka evetarathā mitho bhayaṃ

naivātmalābhādadhi manyate param|| 20

अर्थ

सच्चा पति (रक्षा करनेवाला या ईश्‍वर) वही है, जो स्वयं सर्वथा निर्भय हो और दूसरे भयभीत लोगोंकी सब प्रकारसे रक्षा कर सके। ऐसे पति एकमात्र आप ही हैं; यदि एकसे अधिक ईश्‍वर माने जायँ, तो उन्हें एक-दूसरेसे भय होनेकी सम्भावना है। अतएव आप अपनी प्राप्तिसे बढ़कर और किसी लाभको नहीं मानते॥ २०॥

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