भगवन्! जो स्त्री आपके चरणकमलोंका पूजन ही चाहती है और किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करती—उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं; किन्तु जो किसी एक कामनाको लेकर आपकी उपासना करती है, उसे आप केवल वही वस्तु देते हैं। और जब भोग समाप्त होनेपर वह नष्ट हो जाती है तो उसके लिये उसे सन्तप्त होना पड़ता है॥ २१॥
या तस्य ते पादसरोरुहार्हणं
निकामयेत्साखिलकामलम्पटा ।
तदेव रासीप्सितमीप्सितोऽर्चितो
यद्भग्नयाच्ञा भगवन् प्रतप्यते॥ २१
भगवन्! जो स्त्री आपके चरणकमलोंका पूजन ही चाहती है और किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करती—उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं; किन्तु जो किसी एक कामनाको लेकर आपकी उपासना करती है, उसे आप केवल वही वस्तु देते हैं। और जब भोग समाप्त होनेपर वह नष्ट हो जाती है तो उसके लिये उसे सन्तप्त होना पड़ता है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.18.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 652) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/18/21/