श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.23

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स त्वं ममाप्यच्युत शीर्ष्णि वन्दितं

कराम्बुजं यत्त्वदधायि सात्वताम्।

बिभर्षि मां लक्ष्म वरेण्य मायया

क ईश्‍वरस्येहितमूहितुं विभुरिति॥ २३

sa tvaṃ mamāpyacyuta śīrṣṇi vanditaṃ

karāmbujaṃ yattvadadhāyi sātvatām|

bibharṣi māṃ lakṣma vareṇya māyayā

ka īśvarasyehitamūhituṃ vibhuriti|| 23

अर्थ

अच्युत! आप अपने जिस वन्दनीय करकमलको भक्तोंके मस्तकपर रखते हैं, उसे मेरे सिरपर भी रखिये। वरेण्य! आप मुझे केवल श्रीलांछनरूपसे अपने वक्षःस्थलमें ही धारण करते हैं; सो आप सर्वसमर्थ हैं, आप अपनी मायासे जो लीलाएँ करते हैं, उनका रहस्य कौन जान सकता है?॥ २३॥

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