ramyake ca bhagavataḥ priyatamaṃ mātsyamavatārarūpaṃ tadvarṣapuruṣasya manoḥ prākpradarśitaṃ sa idānīmapi mahatā bhaktiyogenārādhayatīdaṃ codāharati|| 24||
अर्थ
रम्यकवर्षमें भगवान्ने वहाँके अधिपति मनुको पूर्वकालमें अपना परम प्रिय मत्स्यरूप दिखाया था। मनुजी इस समय भी भगवान्के उसी रूपकी बड़े भक्तिभावसे उपासना करते हैं और इस मन्त्रका जप करते हुए स्तुति करते हैं—‘सत्त्वप्रधान मुख्य प्राण सूत्रात्मा तथा मनोबल, इन्द्रियबल और शरीरबल ओंकारपदके अर्थ सर्वश्रेष्ठ भगवान् महामत्स्यको बार-बार नमस्कार है’॥ २४-२५॥✎ 460
यह अर्थ श्लोक 24–25 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
रम्यके च भगवतः प्रियतमं मात्स्यमवताररूपं तद्वर्षपुरुषस्य मनोः प्राक्प्रदर्शितं स इदानीमपि महता भक्तियोगेनाराधयतीदं चोदाहरति॥ २४॥
रम्यकवर्षमें भगवान्ने वहाँके अधिपति मनुको पूर्वकालमें अपना परम प्रिय मत्स्यरूप दिखाया था। मनुजी इस समय भी भगवान्के उसी रूपकी बड़े भक्तिभावसे उपासना करते हैं और इस मन्त्रका जप करते हुए स्तुति करते हैं—‘सत्त्वप्रधान मुख्य प्राण सूत्रात्मा तथा मनोबल, इन्द्रियबल और शरीरबल ओंकारपदके अर्थ सर्वश्रेष्ठ भगवान् महामत्स्यको बार-बार नमस्कार है’॥ २४-२५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.18.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 653) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/18/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)