श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय२ रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा। अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ॐ क्ष्रौम्॥ ८॥✎ 949

oṃ namo bhagavate narasiṃhāya namastejastejase āvirāvirbhava vajranakha vajradaṃṣṭra karmāśayān randhaya randhaya tamo grasa grasa oṃ svāhā| abhayamabhayamātmani bhūyiṣṭhā oṃ kṣraum|| 8||

अर्थ

—‘ओंकारस्वरूप भगवान् श्रीनृसिंहदेवको नमस्कार है। आप अग्‍नि आदि तेजोंके भी तेज हैं, आपको नमस्कार है। हे वज्रनख! हे वज्रदंष्ट्र! आप हमारे समीप प्रकट होइये, प्रकट होइये; हमारी कर्म-वासनाओंको जला डालिये, जला डालिये। हमारे अज्ञानरूप अन्धकारको नष्ट कीजिये, नष्ट कीजिये। ॐ स्वाहा। हमारे अन्तः-करणमें अभयदान देते हुए प्रकाशित होइये। ॐ क्ष्रौम्’॥ ८॥✎ 1611

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—शयान् तमो ग्रस ॐ।

    (मुद्रित पृष्ठ 650)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #949 शब्दोंके बीचका स्थान: रन्धयरन्धय → रन्धय रन्धय
  • #1611 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें