॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.18.8
ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय२ रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा। अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ॐ क्ष्रौम्॥ ८॥✎ 949
oṃ namo bhagavate narasiṃhāya namastejastejase āvirāvirbhava vajranakha vajradaṃṣṭra karmāśayān randhaya randhaya tamo grasa grasa oṃ svāhā| abhayamabhayamātmani bhūyiṣṭhā oṃ kṣraum|| 8||
अर्थ
—‘ओंकारस्वरूप भगवान् श्रीनृसिंहदेवको नमस्कार है। आप अग्नि आदि तेजोंके भी तेज हैं, आपको नमस्कार है। हे वज्रनख! हे वज्रदंष्ट्र! आप हमारे समीप प्रकट होइये, प्रकट होइये; हमारी कर्म-वासनाओंको जला डालिये, जला डालिये। हमारे अज्ञानरूप अन्धकारको नष्ट कीजिये, नष्ट कीजिये। ॐ स्वाहा। हमारे अन्तः-करणमें अभयदान देते हुए प्रकाशित होइये। ॐ क्ष्रौम्’॥ ८॥✎ 1611
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—शयान् तमो ग्रस ॐ।