॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.18.9
स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां
ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया।
मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे
आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी॥ ९
svastyastu viśvasya khalaḥ prasīdatāṃ
dhyāyantu bhūtāni śivaṃ mitho dhiyā|
manaśca bhadraṃ bhajatādadhokṣaje
āveśyatāṃ no matirapyahaitukī|| 9
अर्थ
‘नाथ! विश्वका कल्याण हो, दुष्टोंकी बुद्धि शुद्ध हो, सब प्राणियोंमें परस्पर सद्भावना हो, सभी एक-दूसरेका हितचिन्तन करें, हमारा मन शुभ मार्गमें प्रवृत्त हो और हम सबकी बुद्धि निष्कामभावसे भगवान् श्रीहरिमें प्रवेश करे॥ ९॥✎ 1611