श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स्वस्त्यस्तु विश्‍वस्य खलः प्रसीदतां

ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया।

मनश्‍च भद्रं भजतादधोक्षजे

आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी॥ ९

svastyastu viśvasya khalaḥ prasīdatāṃ

dhyāyantu bhūtāni śivaṃ mitho dhiyā|

manaśca bhadraṃ bhajatādadhokṣaje

āveśyatāṃ no matirapyahaitukī|| 9

अर्थ

‘नाथ! विश्‍वका कल्याण हो, दुष्टोंकी बुद्धि शुद्ध हो, सब प्राणियोंमें परस्पर सद्भावना हो, सभी एक-दूसरेका हितचिन्तन करें, हमारा मन शुभ मार्गमें प्रवृत्त हो और हम सबकी बुद्धि निष्कामभावसे भगवान् श्रीहरिमें प्रवेश करे॥ ९॥✎ 1611

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1611 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे

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