॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.2.13
का वाऽऽत्मवृत्तिरदनाद्धविरङ्ग वाति
विष्णोः कलास्यनिमिषोन्मकरौ च कर्णौ।
उद्विग्न मीनयुगलं द्विजपङ्क्तिशोचि- ✎ 1874
रासन्नभृङ्गनिकरं सर इन्मुखं ते॥ १३
kā vā''tmavṛttiradanāddhaviraṅga vāti
viṣṇoḥ kalāsyanimiṣonmakarau ca karṇau|
udvigna mīnayugalaṃ dvijapaṅktiśoci-
rāsannabhṛṅganikaraṃ sara inmukhaṃ te|| 13
अर्थ
‘प्रियवर! तुम्हारा भोजन क्या है, जिसके खानेसे तुम्हारे मुखसे हवनसामग्रीकी-सी सुगन्ध फैल रही है? मालूम होता है, तुम कोई विष्णुभगवान्की कला ही हो; इसीलिये तुम्हारे कानोंमें कभी पलक न मारनेवाले मकरके आकारके दो कुण्डल हैं। तुम्हारा मुख एक सुन्दर सरोवरके समान है। उसमें तुम्हारे चंचल नेत्र भयसे काँपती हुई दो मछलियोंके समान, दन्तपंक्ति हंसोंके समान और घुँघराली अलकावली भौंरोंके समान शोभायमान है॥ १३॥✎ 437