श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.15

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

तद‍्द्वीपपतिः प्रैयव्रतो राजन् हिरण्यरेता नाम स्वं द्वीपं सप्तभ्यः स्वपुत्रेभ्यो यथाभागं विभज्य स्वयं तप आतिष्ठत वसुवसुदानदृढरुचिना१भिगुप्तस्तुत्यव्रतविविक्तवामदेवनामभ्यः॥ १४॥ तेषां वर्षेषु सीमागिरयो नद्यश्चाभिज्ञाताः२ सप्त सप्तैव चक्रश्‍चतुःशृङ्गः कपिलश्चित्रकूटो३ देवानीक ऊर्ध्वरोमा द्रविण इति रसकुल्या मधुकुल्या मित्रविन्दा श्रुतविन्दा देवगर्भा घृतच्युता मन्त्रमालेति ॥ १५॥ यासां पयोभिः कुशद्वीपौकसः कुशलकोविदाभियुक्तकुलकसंज्ञा भगवन्तं जातवेदसरूपिणं कर्मकौशलेन यजन्ते॥ १६॥

teṣāṃ varṣeṣu sīmāgirayo nadyaścābhijñātāḥ sapta saptaiva cakraścatuḥśṛṅgaḥ kapilaścitrakūṭo devānīka ūrdhvaromā draviṇa iti rasakulyā madhukulyā mitravindā śrutavindā devagarbhā ghṛtacyutā mantramāleti || 15||

अर्थ

उनकी सीमाओंको निश्‍चय करनेवाले सात पर्वत हैं और सात ही नदियाँ हैं। पर्वतोंके नाम चक्र, चतुःशृंग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊर्ध्वरोमा और द्रविण हैं। नदियोंके नाम हैं—रसकुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतविन्दा, देवगर्भा, घृतच्युता और मन्त्रमाला॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—चिराभिगुप्त०।

    (मुद्रित पृष्ठ 664)
  2. २

    प्रा० पा०—ज्ञाताः सप्तैव चक्र०।

    (मुद्रित पृष्ठ 664)
  3. ३

    प्रा० पा०—पिलो वित्रकूटो।

    (मुद्रित पृष्ठ 664)

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