श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.16

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

तद‍्द्वीपपतिः प्रैयव्रतो राजन् हिरण्यरेता नाम स्वं द्वीपं सप्तभ्यः स्वपुत्रेभ्यो यथाभागं विभज्य स्वयं तप आतिष्ठत वसुवसुदानदृढरुचिना१भिगुप्तस्तुत्यव्रतविविक्तवामदेवनामभ्यः॥ १४॥ तेषां वर्षेषु सीमागिरयो नद्यश्चाभिज्ञाताः२ सप्त सप्तैव चक्रश्‍चतुःशृङ्गः कपिलश्चित्रकूटो३ देवानीक ऊर्ध्वरोमा द्रविण इति रसकुल्या मधुकुल्या मित्रविन्दा श्रुतविन्दा देवगर्भा घृतच्युता मन्त्रमालेति ॥ १५॥ यासां पयोभिः कुशद्वीपौकसः कुशलकोविदाभियुक्तकुलकसंज्ञा भगवन्तं जातवेदसरूपिणं कर्मकौशलेन यजन्ते॥ १६॥

yāsāṃ payobhiḥ kuśadvīpaukasaḥ kuśalakovidābhiyuktakulakasaṃjñā bhagavantaṃ jātavedasarūpiṇaṃ karmakauśalena yajante|| 16||

अर्थ

इनके जलमें स्नान करके कुशद्वीपवासी कुशल, कोविद, अभियुक्त और कुलक वर्णके पुरुष अग्‍निस्वरूप भगवान् हरिका यज्ञादि कर्मकौशलके द्वारा पूजन करते हैं॥ १६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—चिराभिगुप्त०।

    (मुद्रित पृष्ठ 664)
  2. २

    प्रा० पा०—ज्ञाताः सप्तैव चक्र०।

    (मुद्रित पृष्ठ 664)
  3. ३

    प्रा० पा०—पिलो वित्रकूटो।

    (मुद्रित पृष्ठ 664)

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