(तथा इस प्रकार स्तुति करते हैं—) ‘अग्ने! आप परब्रह्मको साक्षात् हवि पहुँचानेवाले हैं; अतः भगवान्के अंगभूत देवताओंके यजनद्वारा आप उन परमपुरुषका ही यजन करें’॥ १७॥
परस्य ब्रह्मणः साक्षाज्जातवेदोऽसि हव्यवाट्।
देवानां पुरुषाङ्गानां यज्ञेन पुरुषं यजेति॥ १७॥
(तथा इस प्रकार स्तुति करते हैं—) ‘अग्ने! आप परब्रह्मको साक्षात् हवि पहुँचानेवाले हैं; अतः भगवान्के अंगभूत देवताओंके यजनद्वारा आप उन परमपुरुषका ही यजन करें’॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.20.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 664) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/20/17/