॥ श्रीहरिः ॥
एवमेव दधिमण्डोदात्परतः पुष्करद्वीपस्ततो द्विगुणायामः समन्तत उपकल्पितः समानेन स्वादूदकेन१ समुद्रेण बहिरावृतो यस्मिन् बृहत्पुष्करं२ ज्वलनशिखामलकनकपत्रायुतायुतं भगवतः कमलासनस्याध्यासनं परिकल्पितम्॥ २९॥ तद्द्वीपमध्ये मानसोत्तरनामैक३ ४एवार्वाचीनपराचीनवर्षयोर्मर्यादाचलोऽयुतयोजनोच्छ्रायायामो यत्र तु चतसृषु दिक्षु चत्वारि पुराणि लोकपालानामिन्द्रादीनां यदुपरिष्टात्सूर्यरथस्य मेरुं परिभ्रमतः संवत्सरात्मकं चक्रं५ देवानामहोरात्राभ्यां परिभ्रमति॥ ३०॥ तद्द्वीपस्याप्यधिपतिः प्रैयव्रतो वीतिहोत्रो नामैतस्यात्मजौ रमणकधातकिनामानौ६ वर्षपती नियुज्य स स्वयं पूर्वजवद्भगवत्कर्मशील एवास्ते॥ ३१॥ तद्वर्षपुरुषा भगवन्तं ब्रह्मरूपिणं सकर्मकेण कर्मणाऽऽराधयन्तीदं चोदाहरन्ति॥ ३२॥
tadvarṣapuruṣā bhagavantaṃ brahmarūpiṇaṃ sakarmakeṇa karmaṇā''rādhayantīdaṃ codāharanti|| 32||
अर्थ
वहाँके निवासी ब्रह्मारूप भगवान् हरिकी ब्रह्मसालोक्यादिकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंसे आराधना करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं—॥ ३२॥✎ 469 1975
तद्वर्षपुरुषा भगवन्तं ब्रह्मरूपिणं सकर्मकेण कर्मणाऽऽराधयन्तीदं चोदाहरन्ति॥ ३२॥
वहाँके निवासी ब्रह्मारूप भगवान् हरिकी ब्रह्मसालोक्यादिकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंसे आराधना करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं—॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.20.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 666) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/20/32/टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—दकसमुद्रेण।
(मुद्रित पृष्ठ 666) - २
प्रा० पा०—पुष्कर ज्वलन०।
(मुद्रित पृष्ठ 666) - ३
प्रा० पा०—सोत्तरो नामैक।
(मुद्रित पृष्ठ 666) - ४
प्रा० पा०—प्राचीनयोर्वर्षयो०।
(मुद्रित पृष्ठ 666) - ५
प्रा० पा०—चक्रमहोरात्राभ्यां।
(मुद्रित पृष्ठ 666) - ६
प्रा० पा०—णकघातकनामानौ।
(मुद्रित पृष्ठ 666)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #469 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को
- #1975 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): इनपर → इसपर