sa lokatrayānte parita īśvareṇa vihito yasmātsūryādīnāṃ dhruvāpavargāṇāṃ jyotirgaṇānāṃ gabhastayo'rvācīnāṃstrīlm̐lokān āvitanvānā na kadācitparācīnā bhavitumutsahante tāvadunnahanāyāmaḥ|| 37||
अर्थ
इसे परमात्माने त्रिलोकीके बाहर उसके चारों ओर सीमाके रूपमें स्थापित किया है। यह इतना ऊँचा और लम्बा है कि इसके एक ओरसे तीनों लोकोंको प्रकाशित करनेवाली सूर्यसे लेकर ध्रुवपर्यन्त समस्त ज्योतिर्मण्डलकी किरणें दूसरी ओर नहीं जा सकतीं॥ ३७॥✎ 13571358
स लोकत्रयान्ते परित ईश्वरेण विहितो यस्मात्सूर्यादीनां ध्रुवापवर्गाणां ज्योतिर्गणानां गभस्तयोऽर्वाचीनांस्त्रील्ँलोकान् आवितन्वाना न कदाचित्पराचीना भवितुमुत्सहन्ते तावदुन्नहनायामः॥ ३७॥
इसे परमात्माने त्रिलोकीके बाहर उसके चारों ओर सीमाके रूपमें स्थापित किया है। यह इतना ऊँचा और लम्बा है कि इसके एक ओरसे तीनों लोकोंको प्रकाशित करनेवाली सूर्यसे लेकर ध्रुवपर्यन्त समस्त ज्योतिर्मण्डलकी किरणें दूसरी ओर नहीं जा सकतीं॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.20.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 667) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/20/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1357 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): धु्रवपर्यन्त → धु्रुवपर्यन्त
#1358 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): धु्रुवपर्यन्त → ध्रुवपर्यन्त