श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.24.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

राहु आदिकी स्थिति, अतलादि नीचेके लोकोंका वर्णन

श्रीशुक उवाच

अधस्तात्सवितुर्योजनायुते स्वर्भानुर्नक्षत्रवच्चरतीत्येके योऽसावमरत्वं ग्रहत्वं चालभत भगवदनुकम्पया स्वयमसुरापसदः सैंहिकेयो ह्यतदर्हस्तस्य तात जन्म कर्माणि चोपरिष्टाद्वक्ष्यामः॥ १॥

adhastātsavituryojanāyute svarbhānurnakṣatravaccaratītyeke yo'sāvamaratvaṃ grahatvaṃ cālabhata bhagavadanukampayā svayamasurāpasadaḥ saiṃhikeyo hyatadarhastasya tāta janma karmāṇi copariṣṭādvakṣyāmaḥ|| 1||

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कुछ लोगोंका कथन है कि सूर्यसे दस हजार योजन नीचे राहु नक्षत्रोंके समान घूमता है। इसने भगवान्‌की कृपासे ही देवत्व और ग्रहत्व प्राप्त किया है, स्वयं यह सिंहिकापुत्र असुराधम होनेके कारण किसी प्रकार इस पदके योग्य नहीं है। इसके जन्म और कर्मोंका हम आगे वर्णन करेंगे॥ १॥✎ 474

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #474 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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