॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.24.2
यददस्तरणेर्मण्डलं प्रतपतस्तद्विस्तरतो योजनायुतमाचक्षते द्वादशसहस्रं सोमस्य त्रयोदशसहस्रं राहोर्यः पर्वणि तद्व्यवधानकृद्वैरानुबन्धः सूर्याचन्द्रमसावभिधावति॥ २॥
yadadastaraṇermaṇḍalaṃ pratapatastadvistarato yojanāyutamācakṣate dvādaśasahasraṃ somasya trayodaśasahasraṃ rāhoryaḥ parvaṇi tadvyavadhānakṛdvairānubandhaḥ sūryācandramasāvabhidhāvati|| 2||
अर्थ
सूर्यका जो यह अत्यन्त तपता हुआ मण्डल है, उसका विस्तार दस हजार योजन बतलाया जाता है। इसी प्रकार चन्द्रमण्डलका विस्तार बारह हजार योजन है और राहुका तेरह हजार योजन। अमृतपानके समय राहु देवताके वेषमें सूर्य और चन्द्रमाके बीचमें आकर बैठ गया था, उस समय सूर्य और चन्द्रमाने इसका भेद खोल दिया था; उस वैरको याद करके यह अमावास्या और पूर्णिमाके दिन उनपर आक्रमण करता है॥ २॥