श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.24.27

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

नूनं बतायं भगवानर्थेषु न निष्णातो योऽसाविन्द्रो यस्य सचिवो मन्त्राय१ वृत एकान्ततो बृहस्पतिस्तमतिहाय२ स्वयमुपेन्द्रेणात्मानमयाचतात्मनश्चाशिषो नो एव तद्दास्यमतिगम्भीरवयसः कालस्य मन्वन्तरपरिवृत्तं कियल्लोकत्रयमिदम्॥ २४॥ यस्यानुदास्यमेवास्मत्पितामहः किल वव्रे न तु स्वपित्र्यं यदुताकुतोभयं पदं दीयमानं भगवतः परमिति भगवतोपरते खलु स्वपितरि॥ २५॥ तस्य महानुभावस्यानुपथममृजितकषायः को वास्मद्विधः परिहीणभगवदनुग्रह३ उपजिगमिषतीति॥ २६॥ तस्यानुचरितमुपरिष्टाद्विस्तरिष्यते४ यस्य भगवान् स्वयमखिलजगद‍्गुरुर्नारायणो द्वारि गदापाणिरवतिष्ठते निजजनानुकम्पितहृदयो येनाङ्गुष्ठेन पदा दशकन्धरो योजनायुतायुतं दिग्विजय उच्चाटितः॥ २७॥

tasyānucaritamupariṣṭādvistariṣyate yasya bhagavān svayamakhilajagadgururnārāyaṇo dvāri gadāpāṇiravatiṣṭhate nijajanānukampitahṛdayo yenāṅguṣṭhena padā daśakandharo yojanāyutāyutaṃ digvijaya uccāṭitaḥ|| 27||

अर्थ

राजन्! इस बलिका चरित हम आगे (अष्टम स्कन्धमें) विस्तारसे कहेंगे। अपने भक्तोंके प्रति भगवान्का हृदय दयासे भरा रहता है। इसीसे अखिल जगत‍्के परम पूजनीय गुरु भगवान् नारायण हाथमें गदा लिये सुतल लोकमें राजा बलिके द्वारपर सदा उपस्थित रहते हैं। एक बार जब दिग्विजय करता हुआ घमंडी रावण वहाँ पहुँचा, तब उसे भगवान्‌ने अपने पैरके अँगूठेकी ठोकरसे ही लाखों योजन दूर फेंक दिया था॥ २७॥✎ 481 482 483

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मन्त्राय एकान्ततो वृतो बृह०।

    (मुद्रित पृष्ठ 681)
  2. २

    प्रा० पा०—हायोपेन्द्रेणात्मान् माशिषो नो एव तदनुदास्यमति०।

    (मुद्रित पृष्ठ 681)
  3. ३

    प्रा० पा०—ग्रहमुपजि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 681)
  4. ४

    प्रा० पा०—मुत्तरस्माद्विस्तरिष्यते यद्भगवान्।

    (मुद्रित पृष्ठ 681)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #481 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #482 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #483 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् से → श्रीविष्णुभगवान्‌से

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