श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.25.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

एवम्प्रभावो भगवाननन्तो

दुरन्तवीर्योरुगुणानुभावः ।

मूले रसायाः स्थित आत्मतन्त्रो

यो लीलया क्ष्मां स्थितये बिभर्ति॥ १३

evamprabhāvo bhagavānananto

durantavīryoruguṇānubhāvaḥ |

mūle rasāyāḥ sthita ātmatantro

yo līlayā kṣmāṃ sthitaye bibharti|| 13

अर्थ

वास्तवमें उनके वीर्य, अतिशय गुण और प्रभाव असीम हैं। ऐसे प्रभावशाली भगवान् अनन्त रसातलके मूलमें अपनी ही महिमामें स्थित स्वतन्त्र हैं और सम्पूर्ण लोकोंकी स्थितिके लिये लीलासे ही पृथ्वीको धारण किये हुए हैं॥ १३॥✎ 485 486

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #485 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् को → शेषभगवान्‌को
  • #486 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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