श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.25.14

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

एता ह्येवेह नृभिरुपगन्तव्या गतयो यथाकर्मविनिर्मिता यथोपदेशमनुवर्णिताः कामान् कामयमानैः॥ १४॥ एतावतीर्हि राजन् पुंसः प्रवृत्तिलक्षणस्य धर्मस्य विपाकगतय उच्चावचा विसदृशा यथाप्रश्नं व्याचख्ये किमन्यत्कथयाम इति॥ १५॥

etā hyeveha nṛbhirupagantavyā gatayo yathākarmavinirmitā yathopadeśamanuvarṇitāḥ kāmān kāmayamānaiḥ|| 14||

अर्थ

राजन्! भोगोंकी कामनावाले पुरुषोंकी अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाली भगवान्‌की रची हुई ये ही गतियाँ हैं। इन्हें जिस प्रकार मैंने गुरुमुखसे सुना था, उसी प्रकार तुम्हें सुना दिया॥ १४॥✎ 487

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #487 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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