॥ श्रीहरिः ॥
ये त्विह वै दाम्भिका दम्भयज्ञेषु पशून् विशसन्ति तानमुष्मिल्ँलोके वैशसे नरके पतितान्निरयपतयो यातयित्वा विशसन्ति॥ २५॥
ye tviha vai dāmbhikā dambhayajñeṣu paśūn viśasanti tānamuṣmilm̐loke vaiśase narake patitānnirayapatayo yātayitvā viśasanti|| 25||
अर्थ
जो पाखण्डीलोग पाखण्डपूर्ण यज्ञोंमें पशुओंका वध करते हैं, उन्हें परलोकमें वैशस (विशसन) नरकमें डालकर वहाँके अधिकारी बहुत पीड़ा देकर काटते हैं॥ २५॥
ये त्विह वै दाम्भिका दम्भयज्ञेषु पशून् विशसन्ति तानमुष्मिल्ँलोके वैशसे नरके पतितान्निरयपतयो यातयित्वा विशसन्ति॥ २५॥
जो पाखण्डीलोग पाखण्डपूर्ण यज्ञोंमें पशुओंका वध करते हैं, उन्हें परलोकमें वैशस (विशसन) नरकमें डालकर वहाँके अधिकारी बहुत पीड़ा देकर काटते हैं॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.26.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 691) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/26/25/