श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.26.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तत्र यस्तु परवित्तापत्यकलत्राण्यपहरति स हि कालपाशबद्धो यमपुरुषैरतिभयानकैस्तामिस्रे नरके बलान्‍निपात्यते अनशनानुदपानदण्डताडनसंतर्जनादिभिर्यातनाभिर्यात्यमानो जन्तुर्यत्र कश्मलमासादित एकदैव मूर्च्छामुपयाति तामिस्रप्राये॥ ८॥ एवमेवान्धतामिस्रे यस्तु वञ्चयित्वा पुरुषं दारादीनुपयुङ्क्ते यत्र शरीरी निपात्यमानो यातनास्थो वेदनया नष्टमतिर्नष्टदृष्टिश्‍च भवति यथा वनस्पतिर्वृश्‍च्यमानमूलस्तस्मादन्धतामिस्रं तमुपदिशन्ति॥ ९॥

tatra yastu paravittāpatyakalatrāṇyapaharati sa hi kālapāśabaddho yamapuruṣairatibhayānakaistāmisre narake balānnipātyate anaśanānudapānadaṇḍatāḍanasaṃtarjanādibhiryātanābhiryātyamāno janturyatra kaśmalamāsādita ekadaiva mūrcchāmupayāti tāmisraprāye|| 8||

अर्थ

जो पुरुष दूसरोंके धन, सन्तान अथवा स्त्रियोंका हरण करता है, उसे अत्यन्त भयानक यमदूत कालपाशमें बाँधकर बलात् तामिस्र नरकमें गिरा देते हैं। उस अन्धकारमय नरकमें उसे अन्‍न-जल न देना, डंडे लगाना और भय दिखलाना आदि अनेक प्रकारके उपायोंसे पीड़ित किया जाता है। इससे अत्यन्त दुःखी होकर वह एकाएक मूर्च्छित हो जाता है॥ ८॥

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