॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.26.9
तत्र यस्तु परवित्तापत्यकलत्राण्यपहरति स हि कालपाशबद्धो यमपुरुषैरतिभयानकैस्तामिस्रे नरके बलान्निपात्यते अनशनानुदपानदण्डताडनसंतर्जनादिभिर्यातनाभिर्यात्यमानो जन्तुर्यत्र कश्मलमासादित एकदैव मूर्च्छामुपयाति तामिस्रप्राये॥ ८॥ एवमेवान्धतामिस्रे यस्तु वञ्चयित्वा पुरुषं दारादीनुपयुङ्क्ते यत्र शरीरी निपात्यमानो यातनास्थो वेदनया नष्टमतिर्नष्टदृष्टिश्च भवति यथा वनस्पतिर्वृश्च्यमानमूलस्तस्मादन्धतामिस्रं तमुपदिशन्ति॥ ९॥
evamevāndhatāmisre yastu vañcayitvā puruṣaṃ dārādīnupayuṅkte yatra śarīrī nipātyamāno yātanāstho vedanayā naṣṭamatirnaṣṭadṛṣṭiśca bhavati yathā vanaspatirvṛścyamānamūlastasmādandhatāmisraṃ tamupadiśanti|| 9||
अर्थ
इसी प्रकार जो पुरुष किसी दूसरेको धोखा देकर उसकी स्त्री आदिको भोगता है, वह अन्धतामिस्र नरकमें पड़ता है। वहाँकी यातनाओंमें पड़कर वह जड़से कटे हुए वृक्षके समान, वेदनाके मारे सारी सुध-बुध खो बैठता है और उसे कुछ भी नहीं सूझ पड़ता। इसीसे इस नरकको अन्धतामिस्र कहते हैं॥ ९॥