श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.4.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

इति भागवतधर्मदर्शना नव महाभागवतास्तेषां सुचरितं भगवन्महिमोपबृंहितं वसुदेवनारदसंवादमुपशमायनमुपरिष्टाद् वर्णयिष्यामः॥ १२॥ यवीयांस एकाशीतिर्जायन्तेयाः पितुरादेशकरा महाशालीना महाश्रोत्रिया यज्ञशीलाः कर्मविशुद्धा१ ब्राह्मणा बभूवुः॥ १३॥

yavīyāṃsa ekāśītirjāyanteyāḥ piturādeśakarā mahāśālīnā mahāśrotriyā yajñaśīlāḥ karmaviśuddhā brāhmaṇā babhūvuḥ|| 13||

अर्थ

इनसे छोटे जयन्तीके इक्यासी पुत्र पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले, अति विनीत, महान् वेदज्ञ और निरन्तर यज्ञ करनेवाले थे। वे पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेसे शुद्ध होकर ब्राह्मण हो गये थे॥ १३॥✎ 440

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—कर्मशुद्धा।

    (मुद्रित पृष्ठ 592)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #440 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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