te ca hyarvāktanayā nijalokayātrayāndhaparamparayā''śvastāstamasyandhe svayameva prapatiṣyanti|| 11||
अर्थ
वे अपनी इस नवीन अवैदिक स्वेच्छाकृत प्रवृत्तिमें अन्धपरम्परासे विश्वास करके मतवाले रहनेके कारण स्वयं ही घोर नरकमें गिरेंगे॥ ११॥
ते च ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयान्धपरम्परयाऽऽश्वस्तास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति॥ ११॥
वे अपनी इस नवीन अवैदिक स्वेच्छाकृत प्रवृत्तिमें अन्धपरम्परासे विश्वास करके मतवाले रहनेके कारण स्वयं ही घोर नरकमें गिरेंगे॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.6.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 601) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/6/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)