श्रीशुकदेवजीने कहा—तुम्हारा कहना ठीक है; किन्तु संसारमें जैसे चालाक व्याध अपने पकड़े हुए मृगका विश्वास नहीं करते, उसी प्रकार बुद्धिमान् लोग इस चंचल चित्तका भरोसा नहीं करते॥ २॥
सत्यमुक्तं किन्त्विह वा एके न मनसोऽद्धा विश्रम्भमनवस्थानस्य शठकिरात इव संगच्छन्ते॥ २॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—तुम्हारा कहना ठीक है; किन्तु संसारमें जैसे चालाक व्याध अपने पकड़े हुए मृगका विश्वास नहीं करते, उसी प्रकार बुद्धिमान् लोग इस चंचल चित्तका भरोसा नहीं करते॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.6.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 600) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/6/2/