श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.6.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तथा चोक्तम्—

न कुर्यात्कर्हिचित्सख्यं मनसि ह्यनवस्थिते।

यद्विश्रम्भाच्चिराच्चीर्णं चस्कन्द तप ऐश्‍वरम्॥ ३

tathā coktam—

na kuryātkarhicitsakhyaṃ manasi hyanavasthite|

yadviśrambhāccirāccīrṇaṃ caskanda tapa aiśvaram|| 3

अर्थ

ऐसा ही कहा भी है—‘इस चंचल चित्तसे कभी मैत्री नहीं करनी चाहिये। इसमें विश्वास करनेसे ही मोहिनीरूपमें फँसकर महादेवजीका चिरकालका संचित तप क्षीण हो गया था॥ ३॥

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