श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.7.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

भरतस्तु महाभागवतो यदा भगवतावनितलपरिपालनाय सञ्चिन्तितस्तदनुशासनपरः पञ्चजनीं विश्‍वरूपदुहितरमुपयेमे॥ १॥ तस्यामु ह वा आत्मजान् कार्त्स्न्येनानुरूपानात्मनः पञ्च जनयामास भूतादिरिव भूतसूक्ष्माणि ॥ २॥ सुमतिं राष्ट्रभृतं सुदर्शनमावरणं धूम्रकेतुमिति। अजनाभं नामैतद्वर्षं भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति॥ ३॥✎ 1050

bharatastu mahābhāgavato yadā bhagavatāvanitalaparipālanāya sañcintitastadanuśāsanaparaḥ pañcajanīṃ viśvarūpaduhitaramupayeme|| 1||

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! महाराज भरत बड़े ही भगवद्भक्त थे। भगवान् ऋषभदेवने अपने संकल्पमात्रसे उन्हें पृथ्वीकी रक्षा करनेके लिये नियुक्त कर दिया। उन्होंने उनकी आज्ञामें स्थित रहकर विश्‍वरूपकी कन्या पंचजनीसे विवाह किया॥ १॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1050 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): संञ्च‌िन्तितस्तदनुशासनपर: → सञ्चिन्तितस्तदनुशासनपरः

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