श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.7.2

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

भरतस्तु महाभागवतो यदा भगवतावनितलपरिपालनाय सञ्चिन्तितस्तदनुशासनपरः पञ्चजनीं विश्‍वरूपदुहितरमुपयेमे॥ १॥ तस्यामु ह वा आत्मजान् कार्त्स्न्येनानुरूपानात्मनः पञ्च जनयामास भूतादिरिव भूतसूक्ष्माणि ॥ २॥ सुमतिं राष्ट्रभृतं सुदर्शनमावरणं धूम्रकेतुमिति। अजनाभं नामैतद्वर्षं भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति॥ ३॥✎ 1050

tasyāmu ha vā ātmajān kārtsnyenānurūpānātmanaḥ pañca janayāmāsa bhūtādiriva bhūtasūkṣmāṇi || 2||

अर्थ

जिस प्रकार तामस अहंकारसे शब्दादि पाँच भूततन्मात्र उत्पन्‍न होते हैं—उसी प्रकार पंचजनीके गर्भसे उनके सुमति, राष्ट्रभृत्, सुदर्शन, आवरण और धूम्रकेतु नामक पाँच पुत्र हुए—जो सर्वथा उन्हींके समान थे। इस वर्षको, जिसका नाम पहले अजनाभवर्ष था, राजा भरतके समयसे ही ‘भारतवर्ष’ कहते हैं॥ २-३॥

यह अर्थ श्लोक 2–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1050 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): संञ्च‌िन्तितस्तदनुशासनपर: → सञ्चिन्तितस्तदनुशासनपरः

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