निश्चय ही शान्तस्वभाव और दीनोंकी रक्षा करनेवाले परोपकारी सज्जन ऐसे शरणागतकी रक्षाके लिये अपने बड़े-से-बड़े स्वार्थकी भी परवा नहीं करते’॥ १०॥✎ 19161957
नूनं ह्यार्याः साधव उपशमशीलाः कृपणसुहृद् एवंविधार्थे स्वार्थानपि गुरुतरानुपेक्षन्ते॥ १०॥
निश्चय ही शान्तस्वभाव और दीनोंकी रक्षा करनेवाले परोपकारी सज्जन ऐसे शरणागतकी रक्षाके लिये अपने बड़े-से-बड़े स्वार्थकी भी परवा नहीं करते’॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.8.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 607) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/8/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1916 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): शान्त-स्वभाव → शान्तस्वभाव
#1957 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परवाह → परवा