श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.8.11

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

इति कृतानुषङ्ग आसनशयनाटनस्थानाशनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहृदय आसीत् ॥ ११॥ कुशकुसुमसमित्पलाशफलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालावृकादिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सह हरिणकुणकेन वनं समाविशति॥ १२॥ पथिषु च मुग्धभावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभरहृदयः कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्वहति एवमुत्सङ्ग उरसि चाधायोपलालयन्मुदं परमामवाप॥ १३॥ क्रियायां निर्वर्त्यमानायामन्तरालेऽप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तर्हि वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेन मनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति॥ १४॥✎ 937 1053

iti kṛtānuṣaṅga āsanaśayanāṭanasthānāśanādiṣu saha mṛgajahunā snehānubaddhahṛdaya āsīt || 11||

अर्थ

इस प्रकार उस हरिनके बच्चेमें आसक्ति बढ़ जानेसे बैठते, सोते, टहलते, ठहरते और भोजन करते समय भी उनका चित्त उसके स्नेहपाशमें बँधा रहता था॥ ११॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #937 शब्दोंके बीचका स्थान: ॥११॥ → ॥ ११॥
  • #1053 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): आसीत → आसीत्

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