॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.1.26
भुञ्जानः प्रपिबन् खादन् बालकस्नेहयन्त्रितः।
भोजयन् पाययन्मूढो न वेदागतमन्तकम्॥ २६
bhuñjānaḥ prapiban khādan bālakasnehayantritaḥ|
bhojayan pāyayanmūḍho na vedāgatamantakam|| 26
अर्थ
अजामिल बालकके स्नेह-बन्धनमें बँध गया था। जब वह खाता तब उसे भी खिलाता, जब पानी पीता तो उसे भी पिलाता। इस प्रकार वह अतिशय मूढ़ हो गया था, उसे इस बातका पता ही न चला कि मृत्यु मेरे सिरपर आ पहुँची है॥ २६॥