श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.44

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

सम्भवन्ति हि भद्राणि विपरीतानि चानघाः।

कारिणां गुणसङ्गोऽस्ति देहवान् न ह्यकर्मकृत्॥ ४४

sambhavanti hi bhadrāṇi viparītāni cānaghāḥ|

kāriṇāṃ guṇasaṅgo'sti dehavān na hyakarmakṛt|| 44

अर्थ

निष्पाप पुरुषो! जो प्राणी कर्म करते हैं, उनका गुणोंसे सम्बन्ध रहता ही है। इसीलिये सभीसे कुछ पाप और कुछ पुण्य होते ही हैं और देहवान् होकर कोई भी पुरुष कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता॥ ४४॥✎ 1949

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1949 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मुनष्य → मनुष्य

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