sa eva tatphalaṃ bhuṅkte tathā tāvadamutra vai|| 45
अर्थ
इस लोकमें जो मनुष्य जिस प्रकारका और जितना अधर्म या धर्म करता है, वह परलोकमें उसका उतना और वैसा ही फल भोगता है॥ ४५॥✎ 1949
येन यावान् यथाधर्मो धर्मो वेह समीहितः।
स एव तत्फलं भुङ्क्ते तथा तावदमुत्र वै॥ ४५
इस लोकमें जो मनुष्य जिस प्रकारका और जितना अधर्म या धर्म करता है, वह परलोकमें उसका उतना और वैसा ही फल भोगता है॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 700) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/45/
टिप्पणियाँ
३
प्रा० पा०—समर्जितः।
(मुद्रित पृष्ठ 700)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1949 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मुनष्य → मनुष्य