श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.46

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यथेह देवप्रवरास्त्रैविध्यमुपलभ्यते।

भूतेषु गुणवैचित्र्यात्तथान्यत्रानुमीयते॥ ४६

yatheha devapravarāstraividhyamupalabhyate|

bhūteṣu guṇavaicitryāttathānyatrānumīyate|| 46

अर्थ

देवशिरोमणियो! सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंके भेदके कारण इस लोकमें भी तीन प्रकारके प्राणी दीख पड़ते हैं—पुण्यात्मा, पापात्मा और पुण्य-पाप दोनोंसे युक्त अथवा सुखी, दुःखी और सुख-दुःख दोनोंसे युक्त; वैसे ही परलोकमें भी उनकी त्रिविधताका अनुमान किया जाता है॥ ४६॥

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