॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.1.46
यथेह देवप्रवरास्त्रैविध्यमुपलभ्यते।
भूतेषु गुणवैचित्र्यात्तथान्यत्रानुमीयते॥ ४६
yatheha devapravarāstraividhyamupalabhyate|
bhūteṣu guṇavaicitryāttathānyatrānumīyate|| 46
अर्थ
देवशिरोमणियो! सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंके भेदके कारण इस लोकमें भी तीन प्रकारके प्राणी दीख पड़ते हैं—पुण्यात्मा, पापात्मा और पुण्य-पाप दोनोंसे युक्त अथवा सुखी, दुःखी और सुख-दुःख दोनोंसे युक्त; वैसे ही परलोकमें भी उनकी त्रिविधताका अनुमान किया जाता है॥ ४६॥