॥ श्रीहरिः ॥
तदेतत् षोडशकलं लिङ्गं शक्तित्रयं महत्।
धत्तेऽनुसंसृतिं पुंसि हर्षशोकभयार्तिदाम्॥ ५१
tadetat ṣoḍaśakalaṃ liṅgaṃ śaktitrayaṃ mahat|
dhatte'nusaṃsṛtiṃ puṃsi harṣaśokabhayārtidām|| 51
अर्थ
जीवका यह सोलह कला और सत्त्वादि तीन गुणोंवाला लिंगशरीर अनादि है। यही जीवको बार-बार हर्ष, शोक, भय और पीड़ा देनेवाले जन्म-मृत्युके चक्करमें डालता है॥ ५१॥
तदेतत् षोडशकलं लिङ्गं शक्तित्रयं महत्।
धत्तेऽनुसंसृतिं पुंसि हर्षशोकभयार्तिदाम्॥ ५१
जीवका यह सोलह कला और सत्त्वादि तीन गुणोंवाला लिंगशरीर अनादि है। यही जीवको बार-बार हर्ष, शोक, भय और पीड़ा देनेवाले जन्म-मृत्युके चक्करमें डालता है॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 701) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/1/51/