॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.1.52
देह्यज्ञोऽजितषड्वर्गो नेच्छन् कर्माणि कार्यते।✎ 958
कोशकार इवात्मानं कर्मणाऽऽच्छाद्य मुह्यति॥ ५२
dehyajño'jitaṣaḍvargo necchan karmāṇi kāryate|
kośakāra ivātmānaṃ karmaṇā''cchādya muhyati|| 52
अर्थ
जो जीव अज्ञानवश काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर—इन छः शत्रुओंपर विजय प्राप्त नहीं कर लेता, उसे इच्छा न रहते हुए भी विभिन्न वासनाओंके अनुसार अनेकों कर्म करने पड़ते हैं। वैसी स्थितिमें वह रेशमके कीड़ेके समान अपनेको कर्मके जालमें जकड़ लेता है और इस प्रकार अपने हाथों मोहका शिकार बन जाता है ॥ ५२॥