श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.53

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

कार्यते ह्यवशः कर्म गुणैः स्वाभाविकैर्बलात्॥ ५३

na hi kaścitkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt|

kāryate hyavaśaḥ karma guṇaiḥ svābhāvikairbalāt|| 53

अर्थ

कोई शरीरधारी जीव बिना कर्म किये कभी एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रत्येक प्राणीके स्वाभाविक गुण बलपूर्वक विवश करके उससे कर्म कराते हैं॥ ५३॥

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