श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.10.28

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सर्वे प्रयासा अभवन् विमोघाः

कृताः कृता देवगणेषु दैत्यैः।

कृष्णानुकूलेषु यथा महत्सु

क्षुद्रैः प्रयुक्ता रुशती रूक्षवाचः॥ २८

sarve prayāsā abhavan vimoghāḥ

kṛtāḥ kṛtā devagaṇeṣu daityaiḥ|

kṛṣṇānukūleṣu yathā mahatsu

kṣudraiḥ prayuktā ruśatī rūkṣavācaḥ|| 28

अर्थ

परीक्षित्! जब वृत्रासुरके अनुयायी असुरोंने देखा कि उनके असंख्य अस्त्र-शस्त्र भी देव-सेनाका कुछ न बिगाड़ सके—यहाँतक कि वृक्षों, चट्टानों और पहाड़ोंके बड़े-बड़े शिखरोंसे भी उनके शरीरपर खरोंचतक नहीं आयी, सब-के-सब सकुशल हैं—तब तो वे बहुत डर गये! दैत्यलोग देवताओंको पराजित करनेके लिये जो-जो प्रयत्न करते, वे सब-के-सब निष्फल हो जाते—ठीक वैसे ही, जैसे भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित भक्तोंपर क्षुद्र मनुष्योंके कठोर और अमंगलमय दुर्वचनोंका कोई प्रभाव नहीं पड़ता॥ २७-२८॥

यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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