भगवद्विमुख असुर अपना प्रयत्न व्यर्थ देखकर उत्साहरहित हो गये। उनका वीरताका घमंड जाता रहा। अब वे अपने सरदार वृत्रासुरको युद्धभूमिमें ही छोड़कर भाग खड़े हुए; क्योंकि देवताओंने उनका सारा बल-पौरुष छीन लिया था॥ २९॥
ते स्वप्रयासं वितथं निरीक्ष्य
हरावभक्ता हतयुद्धदर्पाः।
पलायनायाजिमुखे विसृज्य
पतिं मनस्ते दधुरात्तसाराः॥ २९
भगवद्विमुख असुर अपना प्रयत्न व्यर्थ देखकर उत्साहरहित हो गये। उनका वीरताका घमंड जाता रहा। अब वे अपने सरदार वृत्रासुरको युद्धभूमिमें ही छोड़कर भाग खड़े हुए; क्योंकि देवताओंने उनका सारा बल-पौरुष छीन लिया था॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.10.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 756) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/10/29/