॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.10.4
जिजीविषूणां जीवानामात्मा प्रेष्ठ इहेप्सितः।
क उत्सहेत तं दातुं भिक्षमाणाय विष्णवे॥ ४
jijīviṣūṇāṃ jīvānāmātmā preṣṭha ihepsitaḥ|
ka utsaheta taṃ dātuṃ bhikṣamāṇāya viṣṇave|| 4
अर्थ
जो जीव जगत्में जीवित रहना चाहते हैं, उनके लिये शरीर बहुत ही अनमोल, प्रियतम एवं अभीष्ट वस्तु है। ऐसी स्थितिमें स्वयं विष्णुभगवान् भी यदि जीवसे उसका शरीर माँगें तो कौन उसे देनेका साहस करेगा॥ ४॥