॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.10.5
देवा ऊचुः
किं नु तद् दुस्त्यजं ब्रह्मन् पुंसां भूतानुकम्पिनाम्।
भवद्विधानां महतां पुण्यश्लोकेड्यकर्मणाम्॥ ५
kiṃ nu tad dustyajaṃ brahman puṃsāṃ bhūtānukampinām|
bhavadvidhānāṃ mahatāṃ puṇyaślokeḍyakarmaṇām|| 5
अर्थ
देवताओंने कहा—ब्रह्मन्! आप-जैसे उदार और प्राणियोंपर दया करनेवाले महापुरुष, जिनके कर्मोंकी बड़े-बड़े यशस्वी महानुभाव भी प्रशंसा करते हैं, प्राणियोंकी भलाईके लिये कौन-सी वस्तु निछावर नहीं कर सकते॥ ५॥