na hi bhītavadhaḥ ślāghyo na svargyaḥ śūramāninām|| 4
अर्थ
‘क्षुद्र देवताओ! रणभूमिमें पीठ दिखानेवाले कायर असुरोंपर पीछेसे प्रहार करनेमें क्या लाभ है। ये लोग तो अपने माँ-बापके मल-मूत्र हैं। परन्तु अपनेको शूरवीर माननेवाले तुम्हारे-जैसे पुरुषोंके लिये भी तो डरपोकोंको मारना कोई प्रशंसाकी बात नहीं है और न इससे तुम्हें स्वर्ग ही मिल सकता है॥ ४॥
किं व उच्चरितैर्मातुर्धावद्भिः पृष्ठतो हतैः।
न हि भीतवधः श्लाघ्यो न स्वर्ग्यः शूरमानिनाम्॥ ४
‘क्षुद्र देवताओ! रणभूमिमें पीठ दिखानेवाले कायर असुरोंपर पीछेसे प्रहार करनेमें क्या लाभ है। ये लोग तो अपने माँ-बापके मल-मूत्र हैं। परन्तु अपनेको शूरवीर माननेवाले तुम्हारे-जैसे पुरुषोंके लिये भी तो डरपोकोंको मारना कोई प्रशंसाकी बात नहीं है और न इससे तुम्हें स्वर्ग ही मिल सकता है॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.11.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 757) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/11/4/