यदि वः प्रधने श्रद्धा सारं वा क्षुल्लका हृदि।✎ 1870
अग्रे तिष्ठत मात्रं मे न चेद् ग्राम्यसुखे स्पृहा॥ ५
yadi vaḥ pradhane śraddhā sāraṃ vā kṣullakā hṛdi|
agre tiṣṭhata mātraṃ me na ced grāmyasukhe spṛhā|| 5
अर्थ
यदि तुम्हारे मनमें युद्ध करनेकी शक्ति और उत्साह है तथा अब जीवित रहकर विषय-सुख भोगनेकी लालसा नहीं है, तो क्षणभर मेरे सामने डट जाओ और युद्धका मजा चख लो’॥ ५॥
यदि वः प्रधने श्रद्धा सारं वा क्षुल्लका हृदि।
अग्रे तिष्ठत मात्रं मे न चेद् ग्राम्यसुखे स्पृहा॥ ५
यदि तुम्हारे मनमें युद्ध करनेकी शक्ति और उत्साह है तथा अब जीवित रहकर विषय-सुख भोगनेकी लालसा नहीं है, तो क्षणभर मेरे सामने डट जाओ और युद्धका मजा चख लो’॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.11.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 757) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/11/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1870 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): क्षुल्लकाहृदि → क्षुल्लका हृदि