॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.12.1
अथ द्वादशोऽध्यायः
वृत्रासुरका वध
ऋषिरुवाच
एवं जिहासुर्नृप देहमाजौ
मृत्युं वरं विजयान्मन्यमानः।
शूलं प्रगृह्याभ्यपतत् सुरेन्द्रं
यथा महापुरुषं कैटभोऽप्सु॥ १
evaṃ jihāsurnṛpa dehamājau
mṛtyuṃ varaṃ vijayānmanyamānaḥ|
śūlaṃ pragṛhyābhyapatat surendraṃ
yathā mahāpuruṣaṃ kaiṭabho'psu|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! वृत्रासुर रणभूमिमें अपना शरीर छोड़ना चाहता था, क्योंकि उसके विचारसे इन्द्रपर विजय प्राप्त करके स्वर्ग पानेकी अपेक्षा मरकर भगवान्को प्राप्त करना श्रेष्ठ था। इसलिये जैसे प्रलयकालीन जलमें कैटभासुर भगवान् विष्णुपर चोट करनेके लिये दौड़ा था, वैसे ही वह भी त्रिशूल उठाकर इन्द्रपर टूट पड़ा॥ १॥✎ 531