श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.2

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

ततो युगान्ताग्‍निकठोरजिह्व-

माविध्य शूलं तरसासुरेन्द्रः।

क्षिप्त्वा महेन्द्राय विनद्य वीरो

हतोऽसि पापेति रुषा जगाद॥ २

tato yugāntāgnikaṭhorajihva-

māvidhya śūlaṃ tarasāsurendraḥ|

kṣiptvā mahendrāya vinadya vīro

hato'si pāpeti ruṣā jagāda|| 2

अर्थ

वीर वृत्रासुरने प्रलयकालीन अग्‍निकी लपटोंके समान तीखी नोकोंवाले त्रिशूलको घुमाकर बड़े वेगसे इन्द्रपर चलाया और अत्यन्त क्रोधसे सिंहनाद करके बोला—‘पापी इन्द्र! अब तू बच नहीं सकता’॥ २॥✎ 531

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #531 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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