वीर वृत्रासुरने प्रलयकालीन अग्निकी लपटोंके समान तीखी नोकोंवाले त्रिशूलको घुमाकर बड़े वेगसे इन्द्रपर चलाया और अत्यन्त क्रोधसे सिंहनाद करके बोला—‘पापी इन्द्र! अब तू बच नहीं सकता’॥ २॥✎ 531
ततो युगान्ताग्निकठोरजिह्व-
माविध्य शूलं तरसासुरेन्द्रः।
क्षिप्त्वा महेन्द्राय विनद्य वीरो
हतोऽसि पापेति रुषा जगाद॥ २
वीर वृत्रासुरने प्रलयकालीन अग्निकी लपटोंके समान तीखी नोकोंवाले त्रिशूलको घुमाकर बड़े वेगसे इन्द्रपर चलाया और अत्यन्त क्रोधसे सिंहनाद करके बोला—‘पापी इन्द्र! अब तू बच नहीं सकता’॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.12.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 761) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/12/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)